Tuesday, June 9, 2009

गर्भपात कितना सुरक्षित, कितना असुरक्षित

विज्ञानं की तरक्की ने जहाँ एक ओर हमारे जीवन को नए आयाम दिए हैं, वहीँ दूसरी ओर हमारा दखल कुछ अगम्य छेत्रों में बढाया भी है। हम बिना अपने नुकसान का आंकलन किए ही नई विकसित होती तकनीकों का इस्तेमाल करते जा रहे हैं ऐसी ही एक तकनीक का परिणाम है गर्भपात। शहरी वग्रामीण छेत्रों में गर्भपात ज्यादातर इन कारणों से कराये जाते हैं, जैसे; गर्भ निरोधक साधनों के विफल होने पर, गर्भ निरोधक साधनों की अनुपलब्धता, बलात्कार के कारण ठहरा गर्भ, परिवार नियोजन के सम्बन्ध में, लिंग जांच के बाद लड़की का पता लगने पर आदि।

उपरोक्त लिखी सभी समस्याओं के हल के रूप में गर्भपात का उपयोग किया जाता है। आज कल रोज हर अखबार में कम से कम एक विज्ञापन गर्भ समापन की दवाईयों या तथाकथित सुरक्षित गर्भपात क्लिनिक का होता है, जिनका दावा होता है “ बिना किसी परेशानी के गर्भपात से छुटकारा।”

गर्भपात के ऐसे असुरक्षित साधन आज इतनी आसानी से उपलब्ध हैं की कोई भी इनका उपयोग कर सकता है। जैसे सुईयों द्वारा, दवाईयों के प्रयोग से, पारंपरिक साधन आदि से। यदि आप सुरक्षित गर्भपात करवाना चाहतें हैं तो कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है। जैसे ; जब गर्भ की अवधि १२ हफ्ते से कम हो, शारीरिक रूप से महिला स्वस्थ्य हो, महिला में खून की कमी न हो, महिला की सहमती और नाबालिग़ लड़की के अभिभावकों की सहमती हो आदि।

मात्रत्व मृत्यु के पीछे असुरक्षित गर्भपात एक महत्वपूर्ण कारण है। भारत में प्रतिवर्ष ६४ लाख गर्भपात होते हैं। भारत में प्रति एक लाख की जनसँख्या पर चार गर्भपात सेवा प्रदाता उपलब्ध हैं। १६ लाख से ज्यादा गर्भपात अनौपचारिक संसाधनों में प्रत्येक वर्ष होते हैं जहाँ असुरक्षित गर्भपात एवं मृत्यु का भय भी बना रहता है।

गर्भपात वर्तमान में एक ऐसी विकट समस्या के रूप में हमारे समाज में निकलकर आ रही है जो महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने का एक माध्यम है। महिलाओं की दशा में सुधार तथा शिशुओं की जीवन रक्षा के लिए आवश्यक है और इसके लिए योजना एवं अनचाहे गर्भ हेतु परिवार नियोजन के साधनों का सही उपयोग हो सके। महिलाओं को अपने शरीर पर अधिकार को मान्यता देते हुए भारत में कई सारे गर्भपात अधिनियम बनाये गए परन्तु आज भी गाँव और शहरों में कितने ही गर्भपात क्लीनिक बिना पंजीकरण के कार्यरत हैं। पंजीकरण की अनुपस्थिती में न तो सुरक्षा के मानकों का ध्यान रखा जाता है और न ही होने वाले गर्भपात की मृत्यु का। जिसके कारण जिला व राज्य स्तर पर सही आंकडे उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। असुरक्षित गर्भपात को रोंकने के लिए हमे समुदाय को जागरूक करना होगा ओर इसके लिए हमे सामाजिक संवेदनशीलता भी लानी होगी।

अमित द्विवेदी

लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस से जुड़े हुए हैं।


Monday, November 17, 2008

परमाणु उर्जा से बिजली की संभावनाए

परमाणु उर्जा से बिजली की संभावनाए

भारत-अम्रीका परमाणु समझौते पर बहस के दैरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐसी तस्वीर पेश की देश की बिजली की जरूरत पूरी कराने के लिए परमाणु उर्जा के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नही है तथा परमाणु उर्जा पर्यावरणीय दृष्टि से साफ-सुथरी व जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बेहतर विकल्प नही है । आइए देखें इस दावे में कितना दम है।

यूरोप में कुल १९७ परमाणु बिजली घर है जो यूरोप की बिजली की ३५ प्रतिशत जरूरत पूरी करते है. इनमें फ्रांस सबसे अधिक ७८.५ प्रतिशत बिजली का उत्पादन परमाणु उर्जा से करता है. किंतु आने वाले दिनों यूरोप में सिर्फ़ १३ नए परमाणु बिजली घर लगाये जाने वाले है । जर्मनी, इग्लैंड, स्वीडन में कोई नए परमाणु बिजली घर नही लगे जा रहे है । यहाँ तक फ्रांस में भी फिलहाल मात्र एक बिजली घर ही लगाने की तैयारी है। ५५ प्रतिशत यूरोपीय नागरिक इन कारखानों से निकलने वाले रेडियोधर्मी कचरे की वजह से परमाणु बिजली घरो का विरोध करते है। रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित निबटारे का आज हमारे सामने कोई रास्ता नही है। हालांकि कई यूरोपीय संघ की क्योटो मानकों को पूरा करने की प्रतिबद्धता का हवाला देते हुए कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए परमाणु उर्जा को एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे है।
जापान अपने ५५ परमाणु बिजली घरो से अपनी बिजली की ३० प्रतिशत जरूरत पूरी करता है जिसको बड़ा कर २०१७ तक वह ४० प्रतिशत तक ले जाना चाहता है। २ नए कारखाने निर्माणाधीन है तथा १७ कारखाने लगाने की योजना है। जापान चुकी एक द्वीप राष्ट्र है और अपनी उर्जा की जरूरतों के ८० प्रतिशत के लिए वह बाहरी श्रोतों पर निर्भर रहता है अतः उसने फिलहाल परमाणु ऊर्जा को विकल्प के रूप में छोड़ने का फ़ैसला नही लिया है।

अमेरीका में १०४ परमाणु बिजली घर है जिनसे वह अपनी जरूरत की २० प्रतिसत बिजली प्राप्त करता है। किंतु ७० दसक के अंत से अमेरीका में वह स्पष्ट हो गया था की परमाणु बिजली घरो का कोई भविष्य नही है तथा १२० परमाणु बिजली घर लगाने के प्रस्ताव रद्द कर दिए। इसी समय उसके पेंसिलवेनिया राज्य में थ्री माईल आइलैंड परमाणु बिजली घर में एक भयंकर दुर्घटना हुई। इसके बाद से आज तक अमेरिका में एक भी नया परमाणु बिजली घर नही लगा है। अमेरीका के परमाणु बिजली घरो से निकलने वाले कचरे को नेवादा राज्य की युक्का पहाडियों में दफनाने की योजना फिलहाल राजनीतिक विरोध के कारण खटाई में पड़ गई है। परमाणु बिजली का दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में १५ प्रतिशत योगदान है । जिसमे अमेरिका , जापान व् फ्रांस का योगदान ५६.५ प्रतिशत है। दुनिया के ३१ देशो में कुल ४३९ परमाणु बिजली घर है।

७० व ८० के दशक में परमाणु बिजली के उत्पादन की क्षमता में जबरदस्त वृद्धि हुई। ८० के दशक के अंत तक आते-आते इस उद्योग में मंदी आ गई। बढ़ती कीमतों की वजह से परमाणु बिजली घर लगना कोई मुनाफे का सौदा नही रह गया था । तथा इस दौरान परमाणु विरोधी आन्दोलन ने भी जगह-जगह जो पकडा। लोगों के लिए परमाणु बिजली घर में दुर्घटना, रेडियोधर्मी कचरा व परमाणु शस्त्रों का प्रसार उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा के लिए खतरा प्रतीत होने लेन लगे। १९८६ में चेर्नोबिल परमाणु बिजली घर में दुर्घटना अभी तक दुनिया के सबसे भयंकर औद्योगिक दुर्घटना रही है। जिसकी वजय से परमाणु उद्योग का भविष्य अधंकारमय हो गया । न्यूजीलैंड, आयरलैंड व पोलैंड जैसे देशों ने परमाणु बिजली कार्यक्रम शुरू न करने का निर्णय लिया तथा ओस्ट्रेलिया, सुइदन व इटली ने अपने परमाणु बिजली कार्यक्रम धीरे-धीरे बंद करने का निर्णय लिया। ओस्ट्रेलिया जिसके पास यूरेनियम के सबसे बड़े भंडार हैं, ने अभी तक अपने देश में एक भी परमाणु बिजली घर नही लगाया है।

२००३ में परमाणु उर्जा के भविष्य पर अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टी आफ टेक्नोलजी दुआर सम्पन्न एक अध्यन में परमाणु उर्जा की संभावनाओं को निम्नलिखित वजहों से सीमित बताया गया है-तुलनात्मक दस्ती से काफी खर्चीला, मनुषय सुअस्त्ति एवं पर्यावरण के लिए खतरा परमाणु सस्त्र के प्रसार से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे तथा दीगाकालिक दस्ती से परमाणु कचरे के प्रबंधन की चुनोतियाँ. इस अध्ययन के मुताबिक यदि हमें कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगना है तो परमाणु उर्जा का विकल्प खुला रखना पड़ेगा. हलाकि यह मन गया है की परमाणु उर्जा के आलावा हमें इस पर भी ध्यान देना पड़ेगा की बिजली का कम से कम नुकशान हो तथा उर्जा के पुनर्प्रप्य इस्त्रोतों को भी विकसित करना होगा।


भारत के परमाणु कार्यक्रम के जंक होमी भाभा ने १९६२ में यह एलन किया था की भारत में १९८७ तक परमाणु उर्जा से २०,०००-२५००० मेगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता इस्थापित हो जाएगी. १९६७ तक में विक्रम साराभाई ने भाविश्वानी की की सन २००० तक भारत तक भारत परमाणु उर्जा से ४३,५०० मेगावाट बिजली उत्पादन करेगा. १९८४ में परमाणु उर्जा विभाग ने सन २००० के लक्ष्य को संसोधित कर १०,००० मेगावाट कर दिया आज परमाणु उर्जा से बिजली पैदा करने की हमारी इस्थापित क्समता है मात्र ४४७,१२० मेगावाट, जो की भारत की कुल इस्थापित क्समता का सिर्फ़ ३ प्रतिसत है. परमाणु उर्जा के क्षेत्र में हमने जो सपने देखे थे उससे हम बहुत पीछे चल रहे है।


२००६ में योजना आयोग दुआर करे गए एक आध्याँ एक्कार्ट उर्जा नीति के मुताबिक बहुत आशावान प्रीस्थीतियों में यदि हम परमाणु उर्जा से २०१५ तक १५,००० मेगावाट तथा २०२१ तक २९,००० मेगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता इथापित कर लेते है, तो भी परमाणु उर्जा का हिसा कुल बिजली उत्पादन क्षमता का मात्र ७ प्रतिसत ही होगा. अनहोनी परीस्थ्तियों में यदि २०२० तक हम ४०,००० मेगावाट परमाणु बिजली उत्पादन की क्षमता भी इस्थापित कर लेते है तो भी वह कुल क्षमता का ९ प्रतिसत से ज्यादा नही होगा. यानी की परमाणु उर्जा से हमें इतनी बिजली नही मिलने वाली है की देश की बिजली के जरूरत पूरी हो सके।


एक परमाणु बिजली गहर इथापित करने में कम से कम ८-१० वर्षा लगते है. अमेरिका में जो आख़िरी कारखाना लगा है उसको इथापित करने में २३ साल लगे. यदि परमाणु उर्जा को विकल्प के रूप में सुइकार कर कार्बन उत्सर्जन पर कोई प्रभाव डालना है तो हमें हरेक हफ्ते एक नया परमाणु बिजली घर इथापित करना होगा. यह व्यावहारिक नही है.

Tuesday, November 4, 2008

विश्व स्तर पर तपेदिक रोग नियंत्रण

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू एच औ ) के १९४८ में जनम के बाद तपेदिक का उन्मूलन विश्व स्तर पर आयोजित होने लगा। बी सी जी टीकाकरण। जो तपेदिक में प्रभावी था, विश्व स्वास्थ्य संस्था एवं यूनीसेफ की सर्वोच्च प्राथमिकता पर अंकित हो गया। १९५१ में भारतवर्ष में बी सी जी टीकाकरण पूरे जतन से किया गया। देश में आशाजनक प्रभाव प्रर्दशित भी हुए

भारत का अनपढ़ जनमानस अपनी गिरती हुई आर्थिक स्थिति एवं बढती, पेंग मरती हुई आबादी के कारन औषधियों के उपलब्ध होते हुए भी अपना उपचार संतोषजनक रूप से नहीं कर सका। अतः न केवल एक रोगी स्वयं ही निदान न प सका वरन वह सारे समाज के लिए रोग फैलाने का एक कारण व स्रोत बन गया। समय एवं उचित रूप से पूरी औषधि न ले पाने के कारन एक वीभत्स स्तिथि का जन्म भी हो गया और वह थी एम् डी आर अथवा बहु औषधि प्रतिरोधी रोग, जिनका नियंत्रण लगभग असंभव सा हो गया। प्रभावी औषधि से जो रोग सहजता से नियंत्रित हो सकता था अब पुनः एक जटिल समस्या बन कर खड़ा हो गया। यहीं पर आवश्यकता है की सरकार, मॉस मीडिया, चिकित्सक एवं समाजसेवक संयोजित होकर जन मानस को तपेदिक रोग एवं इसके विषय में वृहत सूचना प्रदान करें। Show keyboard

Thursday, August 21, 2008

तम्बाकू सर्वेक्षण


सर्वेक्षण के परिणाम:-कुल ७६३ उत्तरदाताओं में ७० प्रतिशत पुरूष तथा ३० प्रतिशत महिलाएं थी।विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष २००८ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के युवाओं में तम्बाकू का प्रयोग १४.१ प्रतिशत है, जिसमें से पुरुषों में १७.३ प्रतिशत और महिलाओं में ९.७ प्रतिशत है. भारत के वयस्कों में तम्बाकू उपयोग पुरुषों तथा महिलाओं में क्रमशः ५७ प्रतिशत और ३.१ प्रतिशत है.राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की २००६ कि रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर तम्बाकू उपयोग १८ से २४ वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में पाया गया है. हमारे सर्वेक्षण में ज्यादातर उत्तरदाता ३० से ५० वर्ष की आयु वर्ग में थे, इसके बाद १८-३० वर्ष(३९%) ११ प्रतिशत उत्तरदाता ५० वर्ष या इससे ज्यादा आयु के थे और मात्र ६ प्रतिशत उत्तरदाता ०-१८ वर्ष की वर्ग में थे.कई आंकडे इस और इंगित करते हैं कि तम्बाकू प्रयोग सभी प्रकार के शैक्षणिक पृष्ठभूमि के लोगों में प्रचलित है,इसमें वे लोग भी सम्मिलित हैं जिनके पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं है. इस सर्वेक्षण में ज्यादातर उत्तरदाता स्नातक थे(४१%),इसके बाद अन्य तीन वर्गों में कोई महत्वपूर्ण अन्तर नहीं था- परास्नातक(२९%), बारहवीं पास (२८.१०%)तथा वे जिनके पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी(३१%)।सर्वेक्षण के आंकडे यह दर्शाते हैं कि ५७ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कभी भी किसी भी प्रकार के तम्बाकू का सेवन नहीं किया और ४३ प्रतिशत उत्तरदाता तम्बाकू का सेवन करते थे.सर्वेक्षण के तथ्य यह दर्शाते हैं कि ४४ प्रतिशत उत्तरदाता पिछले ०-५ वर्ष से तम्बाकू का सेवन करते आ रहे हैं, ४३ प्रतिशत उत्तरदाता पिछले ५-१० वर्षों से तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं, १२ प्रतिशत उत्तरदाता पिछले १५-२० वर्षों से तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं, जबकि १ प्रतिशत उत्तरदाता २० वर्षों से अधिक से तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं.तम्बाकू के परंपरागत प्रकार (जैसे कि पान) अब पुरानी पीढ़ी का शौक है, नई पीढी अब तम्बाकू के नए प्रकार जैसे- तम्बाकू टूथपेस्ट, गुटखा और सिगरेट का सेवन करती है.तम्बाकू प्रयोग में गुटखा सबसे ज्यादा प्रचलित है. हमारे सर्वेक्षण के अनुसार, ३९ प्रतिशत उत्तरदाता गुटखे का सेवन करते हैं,३२ प्रतिशत सिगरेट पीते हैं,१० प्रतिशत beedi पीते हैं,जबकि १९ प्रतिशत इनमें से सभी प्रकार के तम्बाकू का सेवन करते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्धयन के अनुसार वर्ष १९९१ से २००२ के बीच प्रर्दशित ४४० बॉलीवुड फिल्मों में तम्बाकू सेवन दिखाया गया था, इनमें चार में से तीन फिल्मों में सिगरेट के maadhyam से तम्बाकू सेवन दिखाया गया है. फिल्मों में heero द्वारा तम्बाकू सेवन अक्सर युवाओं को सिगरेट पीने कि तरफ़ आकर्षित करता हैं क्यूंकि वे इसे फैशन और स्टाइल का प्रतीक मानने लगते हैं.३६ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने सभी तीन कारणों से – व्यावसायिक या निजी तनाव, अपने से बड़ों को सेवन करते हुए देखने से, फिल्मी कलाकारों को या फैशन से प्रभावित होकर तम्बाकू का सेवन शुरू किया . ३० प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने तनाव कि वजह से तम्बाकू का सेवन शुरू किया.विश्व स्वस्थ्य संगठन तथा रोग नियंत्रण केंद्र के समर्थन से भारत में वर्ष २०००-२००४ के बीच वैश्विक युवा तम्बाकू सर्वेक्षण किया गया जिस के अनुसार करीब ६८.५ प्रतिशत छात्र जो सिगरेट पीते थे, वे इसे छोड़ना चाहते थे जबकि ७१.४ प्रतिशत पिछले वर्षों में इसे छोड़ने का प्रयास कर चुके हैं. पुरे भारत में, ८४.६ प्रतिशत सिगारेत्ते पीने वाले छात्रों को परिवार के सदस्यों, समुदाय के लोगों, डॉक्टर और मित्रो द्वारा इसे छोड़ने के विषय में सलाह एवं सहायता मिली है.लखनऊ में किए गए हमारे सर्वेक्षण के आंकडो के अनुसार ६९ प्रतिशत सर्वेक्षण उत्तरदाताओं ने तम्बाकू सेवन कि आदत को छोड़ने कि कोशिश कि है, ३१ प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने तम्बाकू सेवन छोड़ने कि कभी कोई कोशिश नही कि.लिखित चेतावनी, टैक्स तथा अन्य प्रतिबन्ध जो सिगारेत्ते के पैकेट पर दिखाई देती हैं वे अन्य तम्बाकू उत्पादों पर अक्सर नही होते. गुटखा, बीडी और अन्य तम्बाकू उत्पादों का उत्पादन तथा मार्केटिंग कुछ हद तक असंगठित सेक्टर द्वारा किया जाता है, जिस कारन इन पर नियम तथा कानून लागु करने में परेशानी आती है. परन्तु जब यह सवाल पूछा गया कि बीडी और सिग्रत्ते में से कौन ज्यादा नुकसानदायक है तो ४९ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि दोनों ही बराबर नुकसानदायक है, ३० प्रतिशत ने कहा कि बीडी ज्यादा नुकसानदायक है .माय २००८ में भारत के स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जरी किए गयी बीडी मोनोग्राफ के अनुसार बीडी कम से कम सिगारेत्ते के बराबर नुकसानदायक है ही. भारत के समतुल्य देश जैसे ब्राजील, थाईलैंड, सिंगापुर, होन्ग कोंग, उरुगुए, वेनेज़ुएला तथा अन्य विकसित देशो ने तम्बोकू के पैकेट का ५० प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा फोटो वाली चेतावनी को दिया है। सर्वेक्षण के अनुसार ५२ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मन कि पैकेट पर फोटो वाली चेतावनी से जागरूकता बढेगी जबकि ४५ प्रतिशत लोगों का यह मन्ना था कि इससे जागरूकता पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा. फोटो वाली चेतावनी का अभी भारत में लागु होना बाकि है इस लिए यह उत्तर लोगों के अनुमानों पर आधारित हैं. पुरे विश्व में फोटो वाली चेतावनी से जागरूकता बढ़ी है, तम्बाकू का सेवन करने वाली संख्या में कमी ई है और इसने तम्बाकू का सेवन छोड़ने के लिए लोगों को प्ररित किया है। थाईलैंड, ब्राजील और एउरोपेये संघ, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और बेल्जियम जैसे देशों में फोटो वाली चेतावनी द्वारा तम्बाकू सेवन करनेवालों के प्रतिशत में भरी कमी आयी है. इन सभी देशों में इस चेतावनी के लागु होने के बाद १% प्रतिशत प्रतिवर्ष कि गिरावट ई है लखनऊ में किए गए सर्वेक्षण में ३७ प्रतिशत उत्तरदाताओं का मन्ना था कि फोटो वाली चेतावनी से लोग तम्बाकू छोड़ने के लिए प्रेरित होंगे जबकि ५६ प्रतिशत लोगों का मन्ना था कि फोटो वाली चेतावनी से लोग तम्बाकू छोड़ने के लिए प्रेरित नहीं होंगे। व्हो के एक अध्हयाँ के अनुसार इस्चेमिक हार्ट दिसेअसे (इह्द) और अप्रत्यक्ष धूम्रपान का आपस में संबंद होता है, जिन महेलावो या पुरूष के पति अथवा पत्नी सिगारेत्ते पीते हैं उनमे इ ह डी होने कि सम्भावना सामान्य से ३० प्रतिशत अधिक होती है. भारत में अप्रत्यक्ष धूम्रपान के शिकार लोगों में कोरोनरी हार्ट दिसेअसे (चद) कि सम्भावना सिगारेत्ते के धुँए से दूर रहने वालो से २५ प्रतिशत ज्यादा होती है. हमारे सर्वेक्षण के अनुसार ७३ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह कहा कि अप्रत्याक्ष्ढूम्रापन कि रोकथाम के लिए सार्वजनिक तह निजी स्थानों पर धूम्रपान पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लग्न चाहिए।केरल कि हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कि गयी थी जिसमें एक महिला ने यह शिकायत दर्ज कि थी कि अक्सर बस से यात्रा करते हुए अपने सह-यात्रिओं के सिगारती पीने के कारन उसे स्वस्थ्य सम्बन्धी परेशानियाँ होती हैं. इस अर्जी पर हाई कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि अप्रत्यक्ष धूम्रपान पर बने जन स्वस्थ्य नियम को सरकार को जल्द से जल्द प्रभावकारी ढंग से लागु करना चाहिए. इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने नवम्बर २००१ में पुरे देश में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगा दिया जैसे स्कूल, लाइब्रेरी, रेलवे वेटिंग रूम तथा बस और ट्रेन. भारत के स्वस्थ्य मंत्री, डॉ. अम्बुमणि रामदोस ने यह कहा है कि २ अक्टूबर २००८ से सभी सार्वजनिक तथा निजी स्थानों पर धूम्रपान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जाएगा. सर्वेक्षण में इस सवाल के जवाब में ७१ प्रतिशत लोगों का कहना था कि इसे प्रभावकारी ढंग से लागु नहीं किया जा सकेगा जबकि १९ प्रतिशत लोगों का मत था कि सरकार इसे प्रभावकारी ढंग से लागु कर पायेगी. लोगों को तम्बाकू के नशे से मुक्त कराने के लिए तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्रों को बढ़ावा देने कि जरूरत है. इसका उल्लेख फ्रेमवर्क कन्वेंशन ओं तोबक्को कंट्रोल (फ.क.टी.क) में किया गया है.भारत सरकार और व्हो के प्रयासों से भारत में राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ कि स्थापना कि गई है. लखनऊ में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक मात्र १३ प्रतिशत लोगों को यह पता है कि तम्बाकू उन्मूलन सेवाएँ उपलब्ध हैं जबकि ५७ प्रतिशत उत्तरदाताओं को इस सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं थी.भारत में स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पायलट प्रोजेक्ट के अधर पर १३ केन्द्रों पर तम्बाकू उन्मूलन केंद्र स्थापित किए हैं। वर्ष २००२ में व्हो ने तम्बाकू नशा उन्मूलन केंद्र (तक्क) कि विभिन्न स्थानों (हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, कैंसर हॉस्पिटल) पर स्ताथ्पना कि जिस से लोगों को तम्बाकू छोड़ने में मदद दी जा सके. लखनऊ में भी व्हो के सहयोग से ऐसे ही केंद्र को स्ताफित किया गया है. सर्वेक्षण में जब यह सवाल किया गया कि क्या प्रदेश के हर जिला अस्पताल तथा प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर ऐसी सुविधा उपलब्ध कराइ जनि चाहिए तो ९६ प्रतिशत लोगों का यह कहना था कि हाँ ऐसी सुविधाएँ हर जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर होनी चाहिए.लोगों को तम्बाकू के नशे से मुक्त कराने के लिए तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्रों को बढ़ावा देने कि जरूरत है. इसका उल्लेख फ्रेमवर्क कन्वेंशन ओं तोबक्को कंट्रोल (फ.क.टी.क) में किया गया है.भारत सरकार और व्हो के प्रयासों से भारत में राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ कि स्थापना कि गई है. लखनऊ में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक मात्र १३ प्रतिशत लोगों को यह पता है कि तम्बाकू उन्मूलन सेवाएँ उपलब्ध हैं जबकि ५७ प्रतिशत उत्तरदाताओं को इस सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं थी.भारत में स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पायलट प्रोजेक्ट के अधर पर १३ केन्द्रों पर तम्बाकू उन्मूलन केंद्र स्थापित किए हैं. वर्ष २००२ में व्हो ने तम्बाकू नशा उन्मूलन केंद्र (तक्क) कि विभिन्न स्थानों (हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, कैंसर हॉस्पिटल) पर स्ताथ्पना कि जिस से लोगों को तम्बाकू छोड़ने में मदद दी जा सके. लखनऊ में भी व्हो के सहयोग से ऐसे ही केंद्र को स्ताफित किया गया है. सर्वेक्षण में जब यह सवाल किया गया कि क्या प्रदेश के हर जिला अस्पताल तथा प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर ऐसी सुविधा उपलब्ध कराइ जनि चाहिए तो ९६ प्रतिशत लोगों का यह कहना था कि हाँ ऐसी सुविधाएँ हर जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर होनी चाहिए.

Wednesday, April 11, 2007

Smokescreen at work: No ifs about this butt !


News- Times of India
April 10 2007
Lucknow

Smokescreen at work: No ifs about this butt !

This ones for the smoking Joes. Did anybody tell them they need to cap those chimneys before their reputations ( and the appraisals at the workplace) go up in smoke? According to a study by the free university of Amsterdam. Smokers are more likely to fall ill take extra days off work. In yet another article by San Diego State University researcher Tarry Conway State. ‘Cigarette smoke might simply be a marker for other underlying factors such as non conformity and high risk-taking that contribute to proper performance’. Improbable as it sounds, the facts remains. That the butt ain’t mightier than butter- which is why we work in the first place remember? Any wonder then doctors and corporate alike think that this couraging smoking at the work place is a good idea? A fact that is corroborated by Dr. Anita Singh, learning manager of a well-known IT firm as she talks about how smoking is actively discouraged in her company. “No employ is allowed to smoke with in the office which in itself acts as a deterrent, because getting up to go out for a fag every now and then is not a very comfortable idea. Not only that, we also organize anti smoking awareness sessions from time to time.” Singh informs other IT company too have been know to take such healthy initiatives to keep the smoke at bay.

It’s a strategy worth considering opines Professor Ramakant former Chief Medical Superintendent, KGMU and is well- known for his anti tobacco lobbying. “ There are several studies to corroborate these facts. Smoking is known to cause excitability, irritability, errors in judgments and problems in decision-making which naturally hamper work,” Ramakant explains. An impediment which has led him to negotiate with the Ministers of Health and Family Welfare, Anbumani Ramados, to empower heads of department in various organizations, including restaurant, to reserve the right to allow their employees and visitors smoke and though medicos like Dr. ID Sharm, head, department of Surgical Oncology, KGMU think “ that one can not force a law onto any corporate house” nevertheless agree that “ smoking as such during is bad.” But sharma doesn’t fail to point out that, not allowing a regular smoke to take his days nicotine intake may lead to poorer performance at work for they are too addicted cigarettes to be able to function without them.”

And psychologist Dr. Sanjay Chugh is wont to believe that “there is no way to suggest that every individual who smokes would perform incompetently at work” clinical psychologist Dr Anjali
Chabbaria hardly conforms to his views. “ Compared to non smokers tend to be less disciplined, have psychological issues and are totally dependent on their addiction. Discouraging smoking at the work- place therefore is a really good idea,” Chabbria opines. Time to win the ciggies? It could work wonders!