Monday, November 17, 2008

परमाणु उर्जा से बिजली की संभावनाए

परमाणु उर्जा से बिजली की संभावनाए

भारत-अम्रीका परमाणु समझौते पर बहस के दैरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐसी तस्वीर पेश की देश की बिजली की जरूरत पूरी कराने के लिए परमाणु उर्जा के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नही है तथा परमाणु उर्जा पर्यावरणीय दृष्टि से साफ-सुथरी व जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बेहतर विकल्प नही है । आइए देखें इस दावे में कितना दम है।

यूरोप में कुल १९७ परमाणु बिजली घर है जो यूरोप की बिजली की ३५ प्रतिशत जरूरत पूरी करते है. इनमें फ्रांस सबसे अधिक ७८.५ प्रतिशत बिजली का उत्पादन परमाणु उर्जा से करता है. किंतु आने वाले दिनों यूरोप में सिर्फ़ १३ नए परमाणु बिजली घर लगाये जाने वाले है । जर्मनी, इग्लैंड, स्वीडन में कोई नए परमाणु बिजली घर नही लगे जा रहे है । यहाँ तक फ्रांस में भी फिलहाल मात्र एक बिजली घर ही लगाने की तैयारी है। ५५ प्रतिशत यूरोपीय नागरिक इन कारखानों से निकलने वाले रेडियोधर्मी कचरे की वजह से परमाणु बिजली घरो का विरोध करते है। रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित निबटारे का आज हमारे सामने कोई रास्ता नही है। हालांकि कई यूरोपीय संघ की क्योटो मानकों को पूरा करने की प्रतिबद्धता का हवाला देते हुए कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए परमाणु उर्जा को एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे है।
जापान अपने ५५ परमाणु बिजली घरो से अपनी बिजली की ३० प्रतिशत जरूरत पूरी करता है जिसको बड़ा कर २०१७ तक वह ४० प्रतिशत तक ले जाना चाहता है। २ नए कारखाने निर्माणाधीन है तथा १७ कारखाने लगाने की योजना है। जापान चुकी एक द्वीप राष्ट्र है और अपनी उर्जा की जरूरतों के ८० प्रतिशत के लिए वह बाहरी श्रोतों पर निर्भर रहता है अतः उसने फिलहाल परमाणु ऊर्जा को विकल्प के रूप में छोड़ने का फ़ैसला नही लिया है।

अमेरीका में १०४ परमाणु बिजली घर है जिनसे वह अपनी जरूरत की २० प्रतिसत बिजली प्राप्त करता है। किंतु ७० दसक के अंत से अमेरीका में वह स्पष्ट हो गया था की परमाणु बिजली घरो का कोई भविष्य नही है तथा १२० परमाणु बिजली घर लगाने के प्रस्ताव रद्द कर दिए। इसी समय उसके पेंसिलवेनिया राज्य में थ्री माईल आइलैंड परमाणु बिजली घर में एक भयंकर दुर्घटना हुई। इसके बाद से आज तक अमेरिका में एक भी नया परमाणु बिजली घर नही लगा है। अमेरीका के परमाणु बिजली घरो से निकलने वाले कचरे को नेवादा राज्य की युक्का पहाडियों में दफनाने की योजना फिलहाल राजनीतिक विरोध के कारण खटाई में पड़ गई है। परमाणु बिजली का दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में १५ प्रतिशत योगदान है । जिसमे अमेरिका , जापान व् फ्रांस का योगदान ५६.५ प्रतिशत है। दुनिया के ३१ देशो में कुल ४३९ परमाणु बिजली घर है।

७० व ८० के दशक में परमाणु बिजली के उत्पादन की क्षमता में जबरदस्त वृद्धि हुई। ८० के दशक के अंत तक आते-आते इस उद्योग में मंदी आ गई। बढ़ती कीमतों की वजह से परमाणु बिजली घर लगना कोई मुनाफे का सौदा नही रह गया था । तथा इस दौरान परमाणु विरोधी आन्दोलन ने भी जगह-जगह जो पकडा। लोगों के लिए परमाणु बिजली घर में दुर्घटना, रेडियोधर्मी कचरा व परमाणु शस्त्रों का प्रसार उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा के लिए खतरा प्रतीत होने लेन लगे। १९८६ में चेर्नोबिल परमाणु बिजली घर में दुर्घटना अभी तक दुनिया के सबसे भयंकर औद्योगिक दुर्घटना रही है। जिसकी वजय से परमाणु उद्योग का भविष्य अधंकारमय हो गया । न्यूजीलैंड, आयरलैंड व पोलैंड जैसे देशों ने परमाणु बिजली कार्यक्रम शुरू न करने का निर्णय लिया तथा ओस्ट्रेलिया, सुइदन व इटली ने अपने परमाणु बिजली कार्यक्रम धीरे-धीरे बंद करने का निर्णय लिया। ओस्ट्रेलिया जिसके पास यूरेनियम के सबसे बड़े भंडार हैं, ने अभी तक अपने देश में एक भी परमाणु बिजली घर नही लगाया है।

२००३ में परमाणु उर्जा के भविष्य पर अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टी आफ टेक्नोलजी दुआर सम्पन्न एक अध्यन में परमाणु उर्जा की संभावनाओं को निम्नलिखित वजहों से सीमित बताया गया है-तुलनात्मक दस्ती से काफी खर्चीला, मनुषय सुअस्त्ति एवं पर्यावरण के लिए खतरा परमाणु सस्त्र के प्रसार से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे तथा दीगाकालिक दस्ती से परमाणु कचरे के प्रबंधन की चुनोतियाँ. इस अध्ययन के मुताबिक यदि हमें कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगना है तो परमाणु उर्जा का विकल्प खुला रखना पड़ेगा. हलाकि यह मन गया है की परमाणु उर्जा के आलावा हमें इस पर भी ध्यान देना पड़ेगा की बिजली का कम से कम नुकशान हो तथा उर्जा के पुनर्प्रप्य इस्त्रोतों को भी विकसित करना होगा।


भारत के परमाणु कार्यक्रम के जंक होमी भाभा ने १९६२ में यह एलन किया था की भारत में १९८७ तक परमाणु उर्जा से २०,०००-२५००० मेगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता इस्थापित हो जाएगी. १९६७ तक में विक्रम साराभाई ने भाविश्वानी की की सन २००० तक भारत तक भारत परमाणु उर्जा से ४३,५०० मेगावाट बिजली उत्पादन करेगा. १९८४ में परमाणु उर्जा विभाग ने सन २००० के लक्ष्य को संसोधित कर १०,००० मेगावाट कर दिया आज परमाणु उर्जा से बिजली पैदा करने की हमारी इस्थापित क्समता है मात्र ४४७,१२० मेगावाट, जो की भारत की कुल इस्थापित क्समता का सिर्फ़ ३ प्रतिसत है. परमाणु उर्जा के क्षेत्र में हमने जो सपने देखे थे उससे हम बहुत पीछे चल रहे है।


२००६ में योजना आयोग दुआर करे गए एक आध्याँ एक्कार्ट उर्जा नीति के मुताबिक बहुत आशावान प्रीस्थीतियों में यदि हम परमाणु उर्जा से २०१५ तक १५,००० मेगावाट तथा २०२१ तक २९,००० मेगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता इथापित कर लेते है, तो भी परमाणु उर्जा का हिसा कुल बिजली उत्पादन क्षमता का मात्र ७ प्रतिसत ही होगा. अनहोनी परीस्थ्तियों में यदि २०२० तक हम ४०,००० मेगावाट परमाणु बिजली उत्पादन की क्षमता भी इस्थापित कर लेते है तो भी वह कुल क्षमता का ९ प्रतिसत से ज्यादा नही होगा. यानी की परमाणु उर्जा से हमें इतनी बिजली नही मिलने वाली है की देश की बिजली के जरूरत पूरी हो सके।


एक परमाणु बिजली गहर इथापित करने में कम से कम ८-१० वर्षा लगते है. अमेरिका में जो आख़िरी कारखाना लगा है उसको इथापित करने में २३ साल लगे. यदि परमाणु उर्जा को विकल्प के रूप में सुइकार कर कार्बन उत्सर्जन पर कोई प्रभाव डालना है तो हमें हरेक हफ्ते एक नया परमाणु बिजली घर इथापित करना होगा. यह व्यावहारिक नही है.

Tuesday, November 4, 2008

विश्व स्तर पर तपेदिक रोग नियंत्रण

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू एच औ ) के १९४८ में जनम के बाद तपेदिक का उन्मूलन विश्व स्तर पर आयोजित होने लगा। बी सी जी टीकाकरण। जो तपेदिक में प्रभावी था, विश्व स्वास्थ्य संस्था एवं यूनीसेफ की सर्वोच्च प्राथमिकता पर अंकित हो गया। १९५१ में भारतवर्ष में बी सी जी टीकाकरण पूरे जतन से किया गया। देश में आशाजनक प्रभाव प्रर्दशित भी हुए

भारत का अनपढ़ जनमानस अपनी गिरती हुई आर्थिक स्थिति एवं बढती, पेंग मरती हुई आबादी के कारन औषधियों के उपलब्ध होते हुए भी अपना उपचार संतोषजनक रूप से नहीं कर सका। अतः न केवल एक रोगी स्वयं ही निदान न प सका वरन वह सारे समाज के लिए रोग फैलाने का एक कारण व स्रोत बन गया। समय एवं उचित रूप से पूरी औषधि न ले पाने के कारन एक वीभत्स स्तिथि का जन्म भी हो गया और वह थी एम् डी आर अथवा बहु औषधि प्रतिरोधी रोग, जिनका नियंत्रण लगभग असंभव सा हो गया। प्रभावी औषधि से जो रोग सहजता से नियंत्रित हो सकता था अब पुनः एक जटिल समस्या बन कर खड़ा हो गया। यहीं पर आवश्यकता है की सरकार, मॉस मीडिया, चिकित्सक एवं समाजसेवक संयोजित होकर जन मानस को तपेदिक रोग एवं इसके विषय में वृहत सूचना प्रदान करें। Show keyboard